बड़ा विचित्र है कि लोकसभा और राज्यसभा में मेज पीट (ठोक) कर समर्थन जताने का तरीका बहुत आम है पर राज्यसभा और लोकसभा की आचारसंहिता (code of conduct) में इसका नियम कहीं लिखा नही हैं।
केवल राज्य सभा के आचार संहिता में ऐसा कहा गया है कि सांसद प्रायः मेज पीट कर समर्थन जताते हैं। पर इसकी क़ोई व्याख्या नही की गई है कि आखिर मेज़ क्यों पीटते हैं? मेज की जगह ताली भी बजा सकते हैं।
काफ़ी ढूंढने के बाद मुझे इसका उत्तर कनाडा के अल्बर्टा विधानसभा के एक रिपोर्ट में मिला। इसके अनुसार यह पुराने जमाने मे वेस्टमिंस्टर (इंग्लैंड की संसद) से चला आ रहा है।
उस समय पक्ष विपक्ष तलवार लिए रहते थे और एक हाथ हमेशा तलवार पर होता था और दूसरा हाथ मुक्त होने की वजह से वो ताली ना बजा कर मेज़ पीट कर अपनी सहमति जताते। धीरे-धीरे यह एक प्रथा बन गई। [1]
भारत मे भी ब्रिटेन का शासन था इसलिए यहां की संसद में भी अभिव्यक्ति की इसी प्रथा को आगे बढ़ाया गया। इसका कोई खास महत्व नही है उल्टा यह तो सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करती है।
2015 ब्रिटिश संसद ने सांसदों को ताली बजाने ने मना किया और इसके बारे में निम्नलिखित तर्क दिए गए। [2]
  • ताली बजाने का कोई तय नियत समय नही होता यह भाषण के प्रभावशाली होने पर निर्भर करता है। अच्छा मोहक होने पर काफी लंबा या नीरस होने पर छोटा हो सकता है। यह संसद की समय की बर्बादी हो सकता है।
  • यह सांसदों को अर्थपूर्ण बहस से भटका कर अच्छी मोहक बहस करने को प्रेरित कर सकता है जिसकी असल मे कोई ज़रूरत नही है। संसद को सनसनी नही बल्कि संयम में विश्वास करना चाहिए।
अब ये मेरा भी अनुमान है कि भारतीय संसद आंख मूंद कर केवल उस पुरानी प्रथा का पालन कर रही है और कोई विशेष कारण नही है।
धन्यवाद।